गीतकार :साहिर लुधियानवी
गायक :मोहम्मद रफी
संगीतकार :सचिनदेव बर्मन
चित्रपट :प्यासा - 1957

ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनिया
ये इंसा के दुश्मन समाजों की दुनिया
ये दौलत के भुखे रवाजों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है
हर एक जिस्म घायल, हर एक रूह प्यासी
निगाहों में उलझन, दिलों में उदासी
ये दुनियां है या आलम-ए-बदहवासी
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है
जहां एक खिलौना है इन्सा की हस्ती
ये बस्ती है मुर्दा परस्तों की बस्ती
यहां पर तो जीवन से मौत सस्ती
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है
जवानी भटकती है बदकार बन कर
जवां जिस्म सजते हैं बाजार बन कर
यहां प्यार होता है व्यापार बन कर
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है
ये दुनिया जहां आदमी कुछ नहीं है
वहा कुछ नहीं है दोस्ती कुछ नहीं है
यहां प्यार की कद्र ही कुछ नहीं है
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है
जला दो इसे, फ़ूंक डालो ये दुनिया
मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया
तुम्हारी है तुम ही सम्भालो ये दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है



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