Monday, March 16, 2009

रहें न रहें हम... महका करेंगे.. बन के कली....






गीतकार : मजरूह सुलतान पुरी
गायक : लता मंगेशकर
संगीतकार : रोशन
चित्रपट : ममता - 1966



रहें न रहें हम, महका करेंगे
बन के कली, बन के सबा, बाग-ए-वफ़ा में.... रहें न रहें हम...

मौसम कोई हो इस चमन में रंग बनके रहेंगे हम खिरामा
चाहत की खुशबू यूं ही जुल्फ़ों से उडेगी, खिजा हो या बहारें
यूं ही झूमते और खिलते रहेंगे, बन के कली, बन के सबा, बाग-ए-वफ़ा में..

खोये हम ऐसे, क्या है मिलना, क्या बिछडना नहीं है याद हम को
कूचे मे दिल के जब से आये सिर्फ़ दिल की जमीं है याद हम को
इसी सरजमीं पे हम तो रहेंगे, बन के कली, बन के सबा, बाग-ए-वफ़ा में...

जब हम न होंगे, तब हमारी खाक पे तुम रुकोगे चलते चलते
अश्कों से भीगी चांदनी में एक सदा सी सुनोगे चलते चलते
वहीं पे कहीं हम तुम से मिलेंगे, बन के कली, बन के सबा, बाग-ए-वफ़ा में..

रहें न रहें हम....

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